Read me in your language

Thursday, 31 December 2015

Say No to Facebook’s Free Basics

Free Basics (FFB) in not a charity but a well planned business model to exploit
India.FFB is the part of digital colonization by west though the internet route
as British had made through sea routes.

Facebook will be benefited more and more as its free basics user will increase and this will happen in these ways-

Firstly,company will make money by selling users information such as-mobile number,email-id,etc. to advertising companies.

Secondly,partner companies related to healthcare, education, jobs,etc.,whose websites will be listed for free access by mobile will be charged.

Thirdly,monopoly over the users privacy will be entertained by monitoring contents. Because company has not restriction, no law not to do so.

As far as the benefit of the India is concerned, definitely FBB may increase the internet penetration in the county and revolutionize Digital India Program but will rural illiterate users will enjoy anything more than just uploading or downloading
multimedia contents?

The electricity is not present in thousands of village of the country for battery
recharge, how long will they be able to use internet?

Low price internet is the better option instead of FBB. Central Government should work for literacy, electricity and to increase the income of people in place of distributing free lollipop like FBB.

Wednesday, 30 December 2015

क़दम मिलाकर चलना होगा।

बाधाएं आती हैं आएं
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

कुछ कांटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

- अटल बिहारी वाजपेयी
Courtesy: http://www.bharatdarshan.co.nz/

आओ फिर से दीया जलाएं

आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दूपहरी में अधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़े
बुझी हुई बाती सुलगाएं
आओ कि से दीया जलाएं।

हम पड़ाव को समझे मंजिल
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
वर्तमान के मोहजाल में
आने वाला कल न भुलाएँ
आओ कि से दीया जलाएं।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज्र बनाने
नव दधीचि हड्डियां गलाए
आओ फिर से दीया जलाएं।

- अटल बिहारी वाजपेयी
Courtesy: http://www.bharatdarshan.co.nz/

अनुत्तरित प्रश्न

जो कल थे,
वे आज नहीं हैं।
जो आज हैं,
वे कल नहीं होंगे।

होने, न होने का क्रम,
इसी तरह चलता रहेगा,
हम हैं, हम रहेंगे,
यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।

सत्य क्या है?
होना या न होना?
या दोनों ही सत्य हैं?
जो है, उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।

मुझे लगता है कि
होना-न-होना एक ही सत्य के
दो आयाम हैं,
शेष सब समझ का फेर,
बुद्धि के व्यायाम हैं।

किन्तु न होने के बाद क्या होता है,
यह प्रश्न अनुत्तरित है।
प्रत्येक नया नचिकेता,
इस प्रश्न की खोज में लगा है।
सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है।

शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा।
यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहें
तो इसमें बुराई क्या है?

हाँ, खोज का सिलसिला न रुके,
धर्म की अनुभूति,
विज्ञान का अनुसंधान,
एक दिन, अवश्य ही
रुद्ध द्वार खोलेगा।

प्रश्न पूछने के बजाय
यक्ष स्वयं उत्तर बोलेगा।

- अटल बिहारी वाजपेयी
Courtesy: http://www.bharatdarshan.co.nz/

ऊँचाई की सच्चाई

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,

पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,


किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।


न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।
मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

- अटल बिहारी वाजपेयी
Courtesy: http://www.bharatdarshan.co.nz/

आज़ादी अभी अधूरी है

आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाकी है,
रावी की शपथ न पूरी है।।

जिनकी लाशों पर पग धर कर
आज़ादी भारत में आई।
वे अब तक हैं खानाबदोश
ग़म की काली बदली छाई।।

कलकत्ते के फुटपाथों पर
जो आँधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त के
बारे में क्या कहते हैं।।

हिंदू के नाते उनका दु:ख
सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो
सभ्यता जहाँ कुचली जाती।।

इंसान जहाँ बेचा जाता,
ईमान ख़रीदा जाता है।
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,
डालर मन में मुस्काता है।।

भूखों को गोली नंगों को
हथियार पिन्हाए जाते हैं।
सूखे कंठों से जेहादी
नारे लगवाए जाते हैं।।

लाहौर, कराची, ढाका पर
मातम की है काली छाया।
पख्तूनों पर, गिलगित पर है
ग़मगीन गुलामी का साया।।

बस इसीलिए तो कहता हूँ
आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं?
थोड़े दिन की मजबूरी है।।

दिन दूर नहीं खंडित भारत को
पुन: अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक
आज़ादी पर्व मनाएँगे।।

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से
कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएँ,
जो खोया उसका ध्यान करें।।

- अटल बिहारी वाजपेयी
Courtesy: http://www.bharatdarshan.co.nz/

आदमी की पहचान

पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी
ऊंचा दिखाई देता है।
जड़ में खड़ा आदमी
नीचा दिखाई देता है।

आदमी न ऊंचा होता है, न नीचा होता है,
न बड़ा होता है, न छोटा होता है।
आदमी सिर्फ आदमी होता है।

पता नहीं, इस सीधे-सपाट सत्य को
दुनिया क्यों नहीं जानती है?
और अगर जानती है,
तो मन से क्यों नहीं मानती

इससे फर्क नहीं पड़ता
कि आदमी कहां खड़ा है?

पथ पर या रथ पर?
तीर पर या प्राचीर पर?

फर्क इससे पड़ता है कि जहां खड़ा है,
या जहां उसे खड़ा होना पड़ा है,
वहां उसका धरातल क्या है?

हिमालय की चोटी पर पहुंच,
एवरेस्ट-विजय की पताका फहरा,
कोई विजेता यदि ईर्ष्या से दग्ध
अपने साथी से विश्वासघात करे,

तो उसका क्या अपराध
इसलिए क्षम्य हो जाएगा कि
वह एवरेस्ट की ऊंचाई पर हुआ था?

नहीं, अपराध अपराध ही रहेगा,
हिमालय की सारी धवलता
उस कालिमा को नहीं ढ़क सकती।

कपड़ों की दुधिया सफेदी जैसे
मन की मलिनता को नहीं छिपा सकती।

किसी संत कवि ने कहा है कि
मनुष्य के ऊपर कोई नहीं होता,
मुझे लगता है कि मनुष्य के ऊपर
उसका मन होता है।

छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता,
टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।

इसीलिए तो भगवान कृष्ण को
शस्त्रों से सज्ज, रथ पर चढ़े,
कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े,
अर्जुन को गीता सुनानी पड़ी थी।

मन हारकर, मैदान नहीं जीते जाते,
न मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं।

चोटी से गिरने से
अधिक चोट लगती है।
अस्थि जुड़ जाती,
पीड़ा मन में सुलगती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि
चोटी पर चढ़ने की चुनौती ही न माने,
इसका अर्थ यह भी नहीं कि
परिस्थिति पर विजय पाने की न ठानें।

आदमी जहां है, वही खड़ा रहे?
दूसरों की दया के भरोसे पर पड़ा रहे?

जड़ता का नाम जीवन नहीं है,
पलायन पुरोगमन नहीं है।

आदमी को चाहिए कि वह जूझे
परिस्थितियों से लड़े,
एक स्वप्न टूटे तो दूसरा गढ़े।

किंतु कितना भी ऊंचा उठे,
मनुष्यता के स्तर से न गिरे,
अपने धरातल को न छोड़े,
अंतर्यामी से मुंह न मोड़े।

एक पांव धरती पर रखकर ही
वामन भगवान ने आकाश-पाताल को जीता था।

धरती ही धारण करती है,
कोई इस पर भार न बने,
मिथ्या अभियान से न तने।

आदमी की पहचान,
उसके धन या आसन से नहीं होती,
उसके मन से होती है।
मन की फकीरी पर
कुबेर की संपदा भी रोती है।

- अटल बिहारी वाजपेयी
Courtesy: http://www.bharatdarshan.co.nz/

Friday, 18 December 2015

अपनी कमजोरियों को कैसे दूर भगायें?

सबसे पहले अपनी कमजोरियों की एक सूची बनायें।इसके पश्चात उसे घटते क्रम में सजा लें-यानि,सबसे बड़ी कमजोरी सबसे ऊपर रखें।अब हरेक दिन अपनी सबसे बड़ी कमजोरी पर कुछ सुधारात्मक काम शुरू करें। 

आपने वरदराज की कहानी सुनी होगी-“रसरी आवत-जात ते,सील पर परत निशान(Practice makes a man perfect“-ये आज भी प्रासंगिक है।लगातार प्रयास से आप अपनी सबसे बड़ी कमजोरी पर भी विजय हासिल कर सकते है।

अपने में छोटा-छोटा सुधार करना प्रारंभ करिए।ये सुधार आगे चलकर इतना बड़ा स्वरूप ले लेगा कि आपको विश्वास ही नहीं होगा कि आप वही है जो पहले थे।आप पीछे पलटकर मत देखिये,सिर्फ आगे चलिये,आज से।

रणनीतिकार का मानना है कि-अगर बड़ी कमजोरी पर आप नियंत्रण कार लेते है तो छोटी-छोटी कमजोरी तो चुटकी में आप निपटा देंगे।आपका आत्मविश्वास इतना प्रबल हो जाएगा कि आपका डर ही ख़त्म हो जाएगा।डर ही हमें कमजोर बनाता है।

इतिहास भरा पड़ा है ऐसे सुरमाओं से जो हमारे-आपके उम्र में कई कमजोरियों से ग्रस्त थे।उन्होने अपनी कमजोरियों को हराया और वे असामान्य व्यक्ति बन गए-कालिदास से लेकर अन्ना हजारे जी को आप याद कर सकते है।

Tuesday, 15 December 2015

संवेदनहीन शिक्षक और छात्र संबंध के लिए जिम्मेदार कौन?

शिक्षा का व्यवसायीकरण संवेदनहीनता मुख्य कारण है। जहाँ तक जिम्मेदारी की बात है तो इसके लिये शिक्षक,छात्र,अभिभावक एवं समाजसेवक सबों की सम्मिलित भूमिका है।
 
शिक्षकों की भूमिका
अधिकांश शिक्षक अपनी नौकरी से असंतुष्ट होते है। वस्तुतः वे कोशिश किसी और नौकरी के लिये कर रहे थे,पर जब कुछ नहीं हुआ तो आ गये पढ़ाने।अनमने ढंग से और मात्र औपचारिकतावश वे पढ़ा रहे है।इस कार्य में उनकी कुछ खास रुचि नहीं है,खुशी भी नहीं है उन्हें।कई बार तो वे ऐसे-ऐसे विषयवस्तु को लिखा जाते जिनकी उन्हें खुद समझ नहीं,वे इसे लिखा इसलिए देते ताकि कोई देखे तो उनके ज्ञान का तारीफ करे।

छात्रों की भूमिका
उथली मानसिकता से ग्रसित छात्रों का एक बड़ा झुंड अपनी रकम वसूलने के लिये कक्षा में आते है।क्या पढ़ाया जा रहा है बहुतों को इनमें कोई रुचि नहीं है।वे आस-पास की चीजों और अपनी धुन में मस्त रहते है।पाठ्यसामग्री को छाप लेना ही ये अपना धर्म समझते है।

अभिभावकों की भूमिका
फसाद की जड़ में ये महानुभाव ही होते है।क्योंकि जो चीज ये खुद नहीं कर पाये अपने समय में उन चीजों को अपने बाल-बच्चों से करवाने की कसम खाये रहते है।अपने बच्चों की रुचि-अरुचि की परवाह किए बगैर,उन्हें ट्यूशन-पर-ट्यूशन देकर हथेली पर सरसों जमाने का ख्वाब देख रहे होते है।बच्चों को एक मशीन बना दिया जाता है।उनको सिर्फ टारगेट मिलता है संवेदना नहीं।

समाजसेवकों की भूमिका
ये संवेदनहीनता को प्रोत्साहित करने वाले अंतिम सिपाही होते है।ये गेस-पेपर,गाईड,एटम-बम,जैसे परीक्षापयोगी सामग्री तैयार करने वाले वर्ग होते है।जो बिना शिक्षक के परीक्षा उत्तीर्ण कराने का दावा करते है।इनका नारा होता है- “कोई नहीं तो हम है आपके,..हरेक कदम पर हम है आपके”।
अब आप ही बताइये जब शिक्षक का कोई काम ही नहीं पड़ेगा तो उनसे रिश्ता क्यों रखे कोई छात्र?

Monday, 14 December 2015

बाधाओं का सामना कैसे करें?

“करो या मरो” की नीति सर्वोत्तम है अपने मार्ग में आने वाली बाधाओं को ध्वस्त करने के लिये।
एक खिलाड़ी की भावना से अपने कार्य को अंजाम दीजिये।एक अभिनेता के स्टाईल में अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का जुनून पैदा करिए।अपने सामने एक आदर्श रखिए और सदा उसके ऐसा बन जाने का प्रयत्न करिये।

विवेकानन्द जी ने कहा-“हजार बार गिरकर भी उठने का साहस मत छोड़ो।“ आप ऐसा करके दिखाईये।आपसे क्यूँ नहीं होगा,एकदम होगा,ऐसी स्वप्रेरणा खुद को दीजिये।अपना उत्साहवर्धक खुद बनिये।

आप जितनी बार असफल होते है,उतनी बार सीखते है।अपने अनुभवों को एकाग्र करिये और बहुगुणे उत्साह के साथ अनवरत प्रयास करिये। दौड़िये,गिरिये,धूल झड़िये और पुनः गतिशील हो जाइए।जिद्दी बनिये अपने लक्ष्य को पाने के हेतु। 
 
भौतिकी विज्ञान कहता है-अगर घर्षण न हो और आपके आगे बढ़ने पर घर्षण बल,जो आपको आगे ढकेलता है,काम न करे तो आप फिसल जायेंगे,आगे बढ़ ही नहीं पायेंगे।उसी प्रकार अगर आपके सामने विरोधी और बाधाएं न हो तो आप तरक्की ही नहीं कर सकते।

लोग आपकी टाँग खींच रहे हो तो उन्हे खींचने दीजिये। इससे आपका टाँग मजबूत बनेगा और आप लंबी दूरी तक चल पायेंगे।विरोधियों को,विपत्तियों को,बाधाओं को अपना काम करने दीजिये,आप अपना काम कीजिये।

Sunday, 13 December 2015

गलतियों पर स्वयं को दंडित कैसे करें?

सर्वप्रथम अपनी गलतियों का मूल्यांकन करें की आपने किस स्तर की गलतियाँ की है।अक्सर हम दो तरह की गलतियाँ किया करते है-पहला,वैसी गलती जिसकी क्षतिपूर्ति न होने पाये,जैसे कि-किसी कि हत्या कर देना। दूसरी, वैसी गलती जिसकी क्षतिपूर्ति संभव है,यथा-परीक्षा में असफलता।

क्षतिपूर्ति न होने पाने वाले गलतियों हेतु दण्ड
आप पीड़ितों कि सहायता में लग सकते है,जैसे कि सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद किया था।अपराधबोध में घुट-घुटकर अपने प्राण गवां देने से अच्छा है कि अपने बचे हुए जीवन को कल्याणकारी और परोपकारी कार्यों में समर्पित कर दीजिये।

क्षतिपूर्ति हो सकने वाले गलतियों हेतु दण्ड
अपने आप से अधिक काम लेना शुरू करिए।जिस मन एवं शरीर नें आपको ईमानदारी पूर्वक अपना वांछित कार्य करने से भटकाया है उनसे अधिकतम वसूलिए। गलतियाँ न दुहराने का कसम लीजिए और उसपर अमल करिए।
समस्याओं का समाधान खोजिये,समस्याओं में नई समस्या मत खोजिये।
मौन रहकर अपनी आत्मसमीक्षा करिए,अपने लक्ष्य के लिये गंभीर बनिये।अपनी गुणवत्ता सुधारिये।
पश्चाताप में अपने वक्त बर्बाद मत करिए,अपनी उत्पादकता बढ़ाइये,आशावादी बनिये।आप जीतेंगे,सिर्फ यही सोचिए।

Saturday, 12 December 2015

अच्छे दिन-कब और कैसे?

स्वच्छ वातावरण मिले,साफ पानी मिले,पर्याप्त बिजली मिले,कामगारों को संतोषप्रद रोजगार मिले,लोगों को एक भय-रहित समाज मिले,असमर्थों को सामाजिक सुरक्षा मिले इस तरह की कल्पना हम सभी किया करते है।

वस्तुतः,अच्छे दिन आदर्शवाद का प्रतीक है।जिसे कई वर्गों में विभाजित किया जा सकता है,यथा-व्यक्तिगत जीवन के अच्छे दिन,सामाजिक जीवन के अच्छे दिन,सरकारी तंत्र में अच्छे दिन,आदि-आदि।

व्यक्तिगत जीवन के अच्छे दिन

जब आप आत्मनिर्भर हो चुके होते है और अपनी एवं अपने पर निर्भर जनों के आवश्यकताओं की पूर्ति भालिभांति कर पते है।अपने मनोवांछित शिक्षा को प्राप्त कर चुके होते है,एक सम्मानजनक स्तर के बिजनेस में स्थान पा चुके होते है,अपने आप को खुश एवं तरोताजा महसूस करते है तो इसे आप अपने लिए अच्छा दिन कह सकते है।

सामाजिक जीवन के अच्छे दिन
जब आपके आस-पास के लोग,समाज के लोग,राष्ट्र और अंतर्राष्ट के लोग भी खुश हों,उनके मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में कोई विघ्न ना हो,उनके बीच परस्पर सामंजस्य हो,आपसी क्लेश और हितों का टकराव ना हो,आपस में सौहार्द्य और भाईचारा हो तो ऐसी स्थिति को सामाजिक क्षेत्र के अच्छे दिन कह सकते है।

सरकारी तंत्र में अच्छे दिन
जब प्रशासनिक कार्य लंबित ना हो,बिना रिश्वत के भी तय समय सीमा पर,बिना अड़चन के आपका कार्य सम्पन्न होने लगे।पदों की नियुक्ति-प्रक्रिया,निलंबन-प्रक्रिया,प्रशासनिक कार्यों की निष्पादन-प्रक्रियाओं में पारदर्शिता आ जाये,भ्रष्ट आचरण ना हो।यहाँ तक की जन-भागीदारी भी सुनिश्चित हो तो यह एक अच्छे दिन का स्वरूप होगा।

Friday, 11 December 2015

हमें अपना जिंदगी कैसे जीना चाहिये?



एक सधी हुई जिंदगी जीने का प्रयास हमें अनवरत करना चाहिए।ऐसी जिंदगी जिसमें जीवन के सारे तत्व संतुलित मात्रा में मौजूद हों।एक विशेषता आपकी जिंदगी में अवश्य होना चाहिये जिसके लिए आप जाने जायें।ये विशेषता किसी भी क्षेत्र में हो सकती है।

जरूरी नहीं कि आप ऊँचे पदों पर पहुँच कर ही विशेष हो सकते है।एक कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी अपने सत्कार्यों से अपना नाम रौशन कर सकता है।आप जहाँ भी हैं वहीं पर लोकहित में अपना सहयोग दीजिये।

आप ईमानदारी पूर्वक अपने काम को करिए।आप लोगों का अहित मत सोचिए।अपने विचारों को हमेशा सात्विक और उन्नत बनाने का प्रयास करिए।

अपने माता-पिता का,अपने से बड़ों का आदर करिए,उनके अनुभवों का सम्मान करिए।अपने से छोटों का स्नेह लीजिए,उन्हें प्यार दीजिये।

अगर आपको कोई जान-बूझकर परेशान करे तो उसे समझाइए और विकट परिस्थिति में ही उनका प्रतिरोध करिए।आप अपने कार्यों पर अपना ध्यान केंद्रित करिए।

एक आदर्शवादी जिंदगी ही सुकून भरी होती है और आप जो भी करते है,वो अपनी खुशी और सुकून के लिए ही करते है।अतः आपका जीवन एक कल्याणकारी हो,अनुकरणीय हो इसी हेतु अपना सर्वस्व लगा दीजिये।

Thursday, 10 December 2015

एक ही स्थान पर अधिक दिनों तक क्यों नहीं रहना चाहिए ?

स्थान परिवर्तन को मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्ति के संपूर्ण विकास के लिये अहम तत्व माना है।कई बार जब आप बीमार पड़ते है तो अनुभवी लोग किसी दूसरे जगह पर जाकर कुछ दिन बिता लेने कि सलाह देते है।कभी-कभी बरकत न होने पर वास्तुविद भी जगह परिवर्तन का परामर्श देते है।एक स्वाभाविक सा प्रश्न आपके मन में उठता है कि आखिर ये लोग ऐसा क्यों बोलते?

अगर सूक्ष्मता से सोचें तो आप पायेंगे कि हरेक स्थान की जलवायु,रहन-सहन,खान-पान,जीवनशैली,आदि एक-दूसरे से अलग होती है।जब आप अपने स्थान से चलकर दूसरे स्थान पर जाते है तो इन चीजों में परिवर्तन होता है।फलस्वरूप,आपकी मनोदशा में भी परिवर्तन आना लाजिमी है।

एक ही स्थान पर बने रहने से आप अपनी क्षमताओं(potentials) का भरपूर उपयोग नहीं कर पाते।आप शारीरिक एवं मानसिक रूप से एक सधी हुई दिनचर्या में अपने आप को ढाल लेते है। आपके सोने-जागने,खाने-पीने,कार्य करने,मनोरंजन करने,इत्यादि चीजों का एक ढर्रा बन जाता है।आप जब जगह बदलते है तो इन चीजों में अंशतः या पूर्णतः परिवर्तन होता है।

एक ही स्थान पर बने रहना आपको "कूप-मंडूक" की श्रेणी में ला देता है।आपके सोचने-विचारने और विभिन्न पक्षों पर वृहत रूप में निर्णय लेने की कला आप में फल-फूल नहीं पती। आपका दायरा दिनोदिन संकुचित होता जाता है।

नई जगह पर जाने से आप में एक ताजगी आती है,नये उमंग और नये जोश के साथ काम करने की प्रेरणा आती है।जब आपका जगह बदलता है,तो आपका सोच बदलता है और अंततः आपकी जीवनशैली और कार्यशैली बदलती है।आपके सामने नई चुनौतियाँ आती है,और आप उन्हे सुलझाते-सुलझाते अपनी प्रतिभा को अधिक प्रखर कर पाते है।

कहा जाता है-"परिवर्तन प्रकृति का नियम है।"अगर प्रकृति परिवर्तनशील है,तो आप क्यों नहीं?

Wednesday, 9 December 2015

जीवन का आयाम क्या है ?

आयाम  का शाब्दिक अर्थ है-पक्ष यानि dimensions।जिस प्रकार हरेक वस्तु की लम्बाई,चौड़ाई और मोटाई होती है,उसी प्रकार हरेक व्यक्ति की अच्छाई,बुराई और गहराई होती है।

प्रत्येक मनुष्य के मूलतः तीन पक्ष होते है,यथा- व्यक्तिगत पक्ष,पारिवारिक पक्ष,सामाजिक पक्ष। इन पक्षों के निर्धारण करने में व्यक्ति की परवरिश,शिक्षा-दीक्षा,नौकरी-पेशा,रिश्ता-नाता,धर्म-कर्म,इत्यादि महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

सामान्यतया,व्यक्ति में जिस पक्ष की प्रमुखता हो  जाती वह  उसी के लिये मशहूर हो जाता है।जो अपने सारे पक्षों को उच्च कोटी का बना लेता है वे महामानव की श्रेणी में आ जाते है जिनकी संख्या नगण्य होती है।

बचपन से लेकर पचपन तक हम कई अवस्थाओं से गुजरते है,यथा-शैशवावस्था,युवावस्था एवं वृधावस्था।इन अवस्थाओं के दौरान हम अपने विभिन्न कर्तव्यों को निभाते है,जैसे कि-ज्ञानार्जन,अर्थोपार्जन,पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाहन,आदि-आदि।

हम अपने जीवन के विभिन्न जिम्मेदारियों को कितनी ईमानदारी के साथ निभाते है,अपने कर्तव्यों का किस प्रकार पालन करते है,यही हमारी जिंदगी के विभिन्न आयाम को पोषण देता है एवं हमारे जीवन कि सार्थकता सुनिश्चित करता है।

Tuesday, 8 December 2015

हम दुनियाँ की आर्थिक समस्या को कैसे सुधार पाएँगे ?

अपनी आवश्यकताओं को कम करने और परिस्थितियों से तालमेल बिठाने की कला अगर सीख लिया जाय तो अपनी आर्थिक समस्याओं से आप बहुत हद तक जूझ सकते है।संसाधनों का अविवेकपूर्ण दोहन ही अधिकांश आर्थिक समस्यायों को जन्म देती है।

जहाँ तक दुनियाँ की आर्थिक समस्यायों को सुधारने की बात है,तो राष्ट्रों के बीच परस्पर सहयोग एवं समन्वय स्थापित करके हम ऐसा कर सकते है।संसाधनों का असामान्य वितरण ही आर्थिक समस्याओं को जन्म देती है।
राष्ट्रों के गरीब या अमीर होने के पीछे कई कारक है,यथा-संसाधनों की प्रचूरता,जनसख्या का आकार एवं मानव-सम्पदा की गुणवत्ता,रोजगार के अवसर,शिक्षा का अवसर एवं स्तर,स्वास्थ्य का स्तर,आदि-आदि।ये कारक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रति-व्यक्ति आय को प्रभावित करते है,जो आर्थिक स्तर का मापदंड है।

अतः,ऐसे राष्ट्र जो उपरोक्त करकों में समृद्ध है,वो अगर अपना नैतिक मूल्य समझे और अपने से अल्प-विकसित राष्ट्रों को अपना आर्थिक सहयोग दे,वहाँ कौशल विकास करे,वहाँ की वस्तुओं और सेवाओं की माँग को उचित मूल्य पर पूरा करे तो उन दीन-दुर्बल राष्ट्रों का कल्याण हो सकता है।

जरूरत है,मानवीय मूल्यों के जागरण की और व्यापारवादी-मानसिकता को बदलने की।ये दुनियाँ उतनी बेबस और असहाय नहीं रहेगी अगर "वसुधैव कुटुंबकम" की संस्कृति को पुनर्जीवित किया जाये।

Monday, 7 December 2015

संपदा का पता

इस प्रश्न के दो मुख्य पहलू है-भौतिक सम्पदा और आध्यात्मिक सम्पदा।भौतिक सम्पदा को कड़ी मेहनत और बचत की कला से अर्जित किया जा सकता है।वहीं आध्यात्मिक सम्पदा को पाने के लिये महापुरुषों ने निःस्वार्थ भाव से ईश्वर का अनुसरण करने का सूत्र दिया है।

वर्तमान समाज की बात करें तो अभी अधिकांश लोग दोहरी नीति को अपनाते है।समय के अनुसार ये उचित भी है।अगर संसार धर्म का पालन करना है तो आपको धन भी चाहिये और मन की शांति के लिये भक्ति भी चाहिये।

हम किसे अधिक महत्व देते है-यह समय और परिस्थिति पर निर्भर करता है।अगर आपकी आर्थिक स्थिति ठीक-ठाक है तो आप आध्यात्मिक सम्पदा अर्जित करने में अधिक ध्यान दे सकते है।

अगर आप मध्यम वर्ग के है तो भौतिक सम्पदा और आध्यात्मिक सम्पदा अर्जित करने के मध्यम मार्ग अपना सकते है।अगर आपका रुझान आध्यात्मिकता की और ज्यादा है तो उधर ही जाइए।

Sunday, 6 December 2015

जीवन में भटकाव क्यों?

आगे का रास्ता कठिन दिखना या कम रोचक दिखना बड़ा कारण है भटकाव का।कई बार आर्थिक समस्याएँ और सामाजिक उपहास भी हमें भटका देती है।इसके अलावे असफलता का हाथ लगना या सफल ना हो पाना भी हमारे चित्त को अधीर कर देता है।

भटकना हमेशा बुरा नहीं होता।अंग्रेज़ी में एक कहावत है-"without deviation from the norm,progress is not possible"-इसे physics के law of reflection के concept पर आप समझ सकते है।

अगर लंबे समय तक  कार्य करने से भी  आपको सफलता नहीं मिल रही है तो अपने कार्य करने की शैली को बदलिये।इसे दिशा बदलना कहते है।यह भी भटकाव का ही एक रूप है,जो सकारात्मक है।वहीं ऊबकर या परिस्थिति से आहत होकर अपना मनोबल गिरा लेना और मार्ग बदल लेना भी भटकाव है,परंतु वह नकारात्मक है।

आप अगर सकारात्मक दिशा में भटकते है तो यह कल्याणकारी है।

Wednesday, 25 November 2015

उम्मीद को, उम्मीद दे।

कठिन डगर पर,
जाने वाले को,
उत्साह दे,आशीष दे,
उम्मीद को उम्मीद दे।
उसे जाने दे,
एक राह बनेगी,
एक मिसाल खड़ी होगी,
थककर जो ठहर रहा है,
उसकी नश तनेगी ।
उस रास्ते पर तू भी चलेगा,
कोई और भी चलेगा,
आने वाले को रोशनी मिलेगा,
कोई एक जाएगा,तो अनेक जाएगा।
रोकने से तेरे कौम की,
भीड़ बढ़ेगी, तेरी गली संकरी पड़ेगी,
अपनी मूर्छा से, उसे मूर्छित मत कर,
उसे तरजीह दे,
उम्मीद को, उम्मीद दे।

गरीब और अमीर

धूल-धूसरित,
सड़क पर,
लड़खड़ाते,
डगमगाते पावों को,
बड़ी दूर तक,
चलते देखा है।

दो जुगत की,
रोटी के लिये,
गलियों में,
चीखते,
चिल्लाते देखा है।
मजबूर कहो,
लालची कहो,या
सनकी कहो,
अमीरों की अमीरी का,
पीछा करते हुये,
कई गरीब को ,
गरीब ही मरते देखा है।

अधीरता

लक्ष्य,अंजान की तरफ,
अंधाधुंध,
तीर चला रहे है,लोग;
अधीर होकर,
दौड़े जा रहे है,लोग;
सुनसान में,
कुतूहल है,
शमशान में भी,
हलचल है,
वादियों में,
वादीयों का,
कहर है;
कायदे,कानून और,
धारा की मारामार है,
मुख्य धारा से इतर,
बहे जा रहे है,लोग।

लक्ष्य

जब हम बड़े होते है,
अपने पैरों पर खड़े होते है,
गिरकर,सम्हले और
तूफानों से लड़े होते है।

वर्षों के,लंबे सफर में,
बेचैन वक्त और,
नाजुक मोड़ से मुड़े होते है;
कुछेक से जुड़े,और
असंख्य से, बिछड़े होते है।

वे लक्ष्य जो, तब अनदिखे थे,
उस मुकाम पर, अब पड़े होते है।

मानसून

आगे-आगे ,
काले मेघ,
उसके पीछे,
सारे मेघ ।

चिलचिलाती धूप,
हुई खतम,
बरसे बरखा,
छमछम...छम ।।

अरमानों का दफन

सूरज की रोशनी,
जब मद्धम होती है,
ऑफिस की प्रेशर,
कुछ कम होती है,
देह मे थकन,और
लवों पे सिकन होती है…


इस कंडीशन में,जब
उनसे अनबन होती है,तो
मेरी आँखें भी,
नम होती है,
अरमानों का दफन,और
सिने में जलन होती है।

घर और सफर

रोज निकलता हूँ,
घर से,
घर की,जरूरतों को
पूरा करने के लिये।

सफर करता हूँ,
मीलों तक,
सफर की,जरूरतों को
पूरा करने के लिये।

घर,सफर करने को
बेबस करता है,और
सफर,घर लौटने
को विवश करता है।।

अपना पता

अक्सर लोग पूछते हैं
मुझसे,मेरे घर का पता,
और मैं पूछता हूँ ,खुद से,
अपने घर का पता।

अपना घर कहाँ है?
वो वोटरकार्ड वाला पता,
ड्राईविंग लाईसेंस वाला पता,
या सर्टिफिकेट वाला पता?

कंक्रीट को घर कहूँ,या
कागज को?
पूछता हूँ ,खुद से ।।

पुरानी चीज

पुरानी बातों को
जब सोचता हूँ,
जी करता है
सोचता ही जाऊँ..।

लोग कहते है-
“पुरानी चीज
‘सोना’ होता है”,
मगर ये ‘सोना’,
चैन से,
‘सोने’ नहीं देता।।

अपनी-अपनी

इतनी भीड़ है,
इस शहर में,
सुध नहीं,किसी को,
अपनी ही,बजह पर।

आगे निकलने की
होड़ है,लेकिन
सारे रुके हुये है,
अपनी ही,जगह पर।

अपने-अपने,सपने के
महल में,
फँसे हुये से,घुट रहे,
अपनी ही,फतह पर।

लोगों का महत्व

कभी हमें लोगों की भीड़,
अशांत कर देती है,
कभी अपनेआप का ,
अकेलापन ।

कभी अपनों का प्यार,
ले डूबता है,
कभी अपनों का,
घृणित व्यवहार।

कईयों के सहयोग से
हम सफल होते है,
कई लोग हमें आजीवन
सफल होने देना नहीं चाहते।

सुकून

सर्द हवाओं से छूकर,
रूह जब सिहरती है..

उमड़ती घटाओं को देखकर,
आँखें जब बंद होती है..

नदी की कल-कल से,
मन जब विकल होता है..

भीगी माटी को कुरेदकर उँगलियाँ,
न जाने क्या महसूस करती हैं।

तलाश

चेहरों में,चेहरे का तलाश,
कभी खत्म नहीं होता..

चेहरा बदलने का अपना प्रयास..
कभी खत्म नहीं होता..

यूं तो अपने भी,कई चेहरे है..
लोगों को दिखाने के लिये..
कुछ ऐसे चेहरे हैं..आँखों में..
जिन्हें भुला देने का..कोई गम,
कोई अहसास नहीं होता ।

बेचैनी

आँखों की पुतलियाँ जब..
एक साथ नहीं ठहर पाती..
तो नींद नहीं आती है..

उमर भर के सफर के यादों को..
मन जब उलटता-पुलटता है..
तो नींद नहीं आती है..



गीली पलकों से झरते झरने..
बीहड़ रातों में.. जब शोर मचाती है..
तो नींद नहीं आती है..

समझौता

जग की मानें तो..
अपनी जान जाती है..
अपनी मानें तो..
जग की जान जाती है..।

जग में भी जीना है..
अपने को भी..जीना है..
अपने-आप में जीते है तो..
अपनों की जान जाती है..।

अंत में,
जग के लिये जीते है..
अपनों के लिये जीते है..
तो अपनी जान जाती है 

भावुकता

कुतर-कुतरकर नाखून को
दाँतों से..फेंकना..
अच्छा लगता है।

टक-टकी लगाकर कहीं..
अपलक ताकना..
अच्छा लगता है।


मसलकर पत्तियों को..
चुटकियों से..रगड़ना..
अच्छा लगता है।

छानकर धूल से..कंकरों को
पानी में..छींटना..
अच्छा लगता है।

सिहरन

एक तरफ सूकूँ की गोद है,
सो जाने के लिये,मूँदकर आँखों को।
दुजी तरफ असहनीय संघर्ष है,
मर जाने के लिये,रोककर साँसों को।

जितना हासिल हुआ है नाकाफी है,
लगता है,सीने में आग अभी बाँकी है।
रूहें खड़ी होती है अभी भी,
रगों में खून खौलती है अभी भी।

परिंदों-सा बेघर घूमने की आजादी है,फिर भी,
चारदीवारी में कैद रहने का मन आदी है।
बेखौफ होकर निकलता हूँ सबेरे अपने घर से,
बटोरकर शाम तक कुछ-न-कुछ ले आता इस शहर से!

निडर मन

निडर होकर जब मन सोचता है,
जीतने की ख्वाब देखता है
सौ मुश्किलें आ सामने से,
बार-बार रोकता है।

जूझता है जब कभी मन
अंतर्द्व्न्द की आँन्धियों से,
टूटते विश्वास को,
बेरहमी से झकझोरता है।

परेशानियों से आहत होकर
रगों की लहू जब ठहरती है,
शांत मन की चिंगारियाँ
भड़क उठने को मसोसता है।

संघर्ष की प्रेरणा

बीते हुये कल की उपलब्धियाँ,और
आने वाले कल की उम्मीदें,
संघर्ष करने को प्रेरित करते है।

अपनों को दिये गये आश्वासन,और
विरोधियों को दिये गये वचन,
संघर्ष करने को प्रेरित करते है।



अपनी जिंदगी तो हम बड़ी सहजता,और
सरलता से जीना चाहते
ये तो खुदा का इरादा है,कि वे
बेचैन होकर जीने को प्रेरित करते है।