सर्द हवाओं से छूकर,
रूह जब सिहरती है..
उमड़ती घटाओं को देखकर,
आँखें जब बंद होती है..
रूह जब सिहरती है..
उमड़ती घटाओं को देखकर,
आँखें जब बंद होती है..
नदी की कल-कल से,
मन जब विकल होता है..
भीगी माटी को कुरेदकर उँगलियाँ,
न जाने क्या महसूस करती हैं।
मन जब विकल होता है..
भीगी माटी को कुरेदकर उँगलियाँ,
न जाने क्या महसूस करती हैं।
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