जब हम बड़े होते है,
अपने पैरों पर खड़े होते है,
गिरकर,सम्हले और
तूफानों से लड़े होते है।
अपने पैरों पर खड़े होते है,
गिरकर,सम्हले और
तूफानों से लड़े होते है।
वर्षों के,लंबे सफर में,
बेचैन वक्त और,
नाजुक मोड़ से मुड़े होते है;
कुछेक से जुड़े,और
असंख्य से, बिछड़े होते है।
वे लक्ष्य जो, तब अनदिखे थे,
उस मुकाम पर, अब पड़े होते है।
बेचैन वक्त और,
नाजुक मोड़ से मुड़े होते है;
कुछेक से जुड़े,और
असंख्य से, बिछड़े होते है।
वे लक्ष्य जो, तब अनदिखे थे,
उस मुकाम पर, अब पड़े होते है।
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