अपनी आवश्यकताओं को कम करने और परिस्थितियों से तालमेल बिठाने की कला
अगर सीख लिया जाय तो अपनी आर्थिक समस्याओं से आप बहुत हद तक जूझ सकते
है।संसाधनों का अविवेकपूर्ण दोहन ही अधिकांश आर्थिक समस्यायों को जन्म देती
है।
जहाँ तक दुनियाँ की आर्थिक समस्यायों को सुधारने की बात है,तो राष्ट्रों के बीच परस्पर सहयोग एवं समन्वय स्थापित करके हम ऐसा कर सकते है।संसाधनों का असामान्य वितरण ही आर्थिक समस्याओं को जन्म देती है।
राष्ट्रों के गरीब या अमीर होने के पीछे कई कारक है,यथा-संसाधनों की प्रचूरता,जनसख्या का आकार एवं मानव-सम्पदा की गुणवत्ता,रोजगार के अवसर,शिक्षा का अवसर एवं स्तर,स्वास्थ्य का स्तर,आदि-आदि।ये कारक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रति-व्यक्ति आय को प्रभावित करते है,जो आर्थिक स्तर का मापदंड है।
अतः,ऐसे राष्ट्र जो उपरोक्त करकों में समृद्ध है,वो अगर अपना नैतिक मूल्य समझे और अपने से अल्प-विकसित राष्ट्रों को अपना आर्थिक सहयोग दे,वहाँ कौशल विकास करे,वहाँ की वस्तुओं और सेवाओं की माँग को उचित मूल्य पर पूरा करे तो उन दीन-दुर्बल राष्ट्रों का कल्याण हो सकता है।
जरूरत है,मानवीय मूल्यों के जागरण की और व्यापारवादी-मानसिकता को बदलने की।ये दुनियाँ उतनी बेबस और असहाय नहीं रहेगी अगर "वसुधैव कुटुंबकम" की संस्कृति को पुनर्जीवित किया जाये।
जहाँ तक दुनियाँ की आर्थिक समस्यायों को सुधारने की बात है,तो राष्ट्रों के बीच परस्पर सहयोग एवं समन्वय स्थापित करके हम ऐसा कर सकते है।संसाधनों का असामान्य वितरण ही आर्थिक समस्याओं को जन्म देती है।
राष्ट्रों के गरीब या अमीर होने के पीछे कई कारक है,यथा-संसाधनों की प्रचूरता,जनसख्या का आकार एवं मानव-सम्पदा की गुणवत्ता,रोजगार के अवसर,शिक्षा का अवसर एवं स्तर,स्वास्थ्य का स्तर,आदि-आदि।ये कारक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रति-व्यक्ति आय को प्रभावित करते है,जो आर्थिक स्तर का मापदंड है।
अतः,ऐसे राष्ट्र जो उपरोक्त करकों में समृद्ध है,वो अगर अपना नैतिक मूल्य समझे और अपने से अल्प-विकसित राष्ट्रों को अपना आर्थिक सहयोग दे,वहाँ कौशल विकास करे,वहाँ की वस्तुओं और सेवाओं की माँग को उचित मूल्य पर पूरा करे तो उन दीन-दुर्बल राष्ट्रों का कल्याण हो सकता है।
जरूरत है,मानवीय मूल्यों के जागरण की और व्यापारवादी-मानसिकता को बदलने की।ये दुनियाँ उतनी बेबस और असहाय नहीं रहेगी अगर "वसुधैव कुटुंबकम" की संस्कृति को पुनर्जीवित किया जाये।
No comments:
Post a Comment