स्थान परिवर्तन को मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्ति के संपूर्ण विकास के लिये अहम तत्व माना है।कई बार जब आप बीमार पड़ते है तो अनुभवी लोग किसी दूसरे जगह पर जाकर कुछ दिन बिता लेने कि सलाह देते है।कभी-कभी बरकत न होने पर वास्तुविद भी जगह परिवर्तन का परामर्श देते है।एक स्वाभाविक सा प्रश्न आपके मन में उठता है कि आखिर ये लोग ऐसा क्यों बोलते?
अगर सूक्ष्मता से सोचें तो आप पायेंगे कि हरेक स्थान की जलवायु,रहन-सहन,खान-पान,जीवनशैली,आदि एक-दूसरे से अलग होती है।जब आप अपने स्थान से चलकर दूसरे स्थान पर जाते है तो इन चीजों में परिवर्तन होता है।फलस्वरूप,आपकी मनोदशा में भी परिवर्तन आना लाजिमी है।
एक ही स्थान पर बने रहने से आप अपनी क्षमताओं(potentials) का भरपूर उपयोग नहीं कर पाते।आप शारीरिक एवं मानसिक रूप से एक सधी हुई दिनचर्या में अपने आप को ढाल लेते है। आपके सोने-जागने,खाने-पीने,कार्य करने,मनोरंजन करने,इत्यादि चीजों का एक ढर्रा बन जाता है।आप जब जगह बदलते है तो इन चीजों में अंशतः या पूर्णतः परिवर्तन होता है।
एक ही स्थान पर बने रहना आपको "कूप-मंडूक" की श्रेणी में ला देता है।आपके सोचने-विचारने और विभिन्न पक्षों पर वृहत रूप में निर्णय लेने की कला आप में फल-फूल नहीं पती। आपका दायरा दिनोदिन संकुचित होता जाता है।
नई जगह पर जाने से आप में एक ताजगी आती है,नये उमंग और नये जोश के साथ काम करने की प्रेरणा आती है।जब आपका जगह बदलता है,तो आपका सोच बदलता है और अंततः आपकी जीवनशैली और कार्यशैली बदलती है।आपके सामने नई चुनौतियाँ आती है,और आप उन्हे सुलझाते-सुलझाते अपनी प्रतिभा को अधिक प्रखर कर पाते है।
कहा जाता है-"परिवर्तन प्रकृति का नियम है।"अगर प्रकृति परिवर्तनशील है,तो आप क्यों नहीं?
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