सर्वप्रथम अपनी गलतियों का मूल्यांकन करें की आपने किस
स्तर की गलतियाँ की है।अक्सर हम दो तरह की गलतियाँ किया करते है-पहला,वैसी
गलती जिसकी क्षतिपूर्ति न होने पाये,जैसे कि-किसी कि हत्या कर देना। दूसरी,
वैसी गलती जिसकी क्षतिपूर्ति संभव है,यथा-परीक्षा में असफलता।
क्षतिपूर्ति न होने पाने वाले गलतियों हेतु दण्ड
आप पीड़ितों कि सहायता में लग सकते है,जैसे
कि सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद किया था।अपराधबोध में घुट-घुटकर अपने प्राण गवां
देने से अच्छा है कि अपने बचे हुए जीवन को कल्याणकारी और परोपकारी कार्यों में समर्पित
कर दीजिये।
क्षतिपूर्ति हो सकने वाले गलतियों हेतु दण्ड
अपने आप से अधिक काम लेना शुरू करिए।जिस मन एवं शरीर
नें आपको ईमानदारी पूर्वक अपना वांछित कार्य करने से भटकाया है उनसे अधिकतम वसूलिए।
गलतियाँ न दुहराने का कसम लीजिए और उसपर अमल करिए।
समस्याओं का समाधान खोजिये,समस्याओं
में नई समस्या मत खोजिये।
मौन रहकर अपनी आत्मसमीक्षा करिए,अपने
लक्ष्य के लिये गंभीर बनिये।अपनी गुणवत्ता सुधारिये।
पश्चाताप में अपने वक्त बर्बाद मत करिए,अपनी
उत्पादकता बढ़ाइये,आशावादी बनिये।आप जीतेंगे,सिर्फ
यही सोचिए।
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