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Wednesday, 25 November 2015

उम्मीद को, उम्मीद दे।

कठिन डगर पर,
जाने वाले को,
उत्साह दे,आशीष दे,
उम्मीद को उम्मीद दे।
उसे जाने दे,
एक राह बनेगी,
एक मिसाल खड़ी होगी,
थककर जो ठहर रहा है,
उसकी नश तनेगी ।
उस रास्ते पर तू भी चलेगा,
कोई और भी चलेगा,
आने वाले को रोशनी मिलेगा,
कोई एक जाएगा,तो अनेक जाएगा।
रोकने से तेरे कौम की,
भीड़ बढ़ेगी, तेरी गली संकरी पड़ेगी,
अपनी मूर्छा से, उसे मूर्छित मत कर,
उसे तरजीह दे,
उम्मीद को, उम्मीद दे।

गरीब और अमीर

धूल-धूसरित,
सड़क पर,
लड़खड़ाते,
डगमगाते पावों को,
बड़ी दूर तक,
चलते देखा है।

दो जुगत की,
रोटी के लिये,
गलियों में,
चीखते,
चिल्लाते देखा है।
मजबूर कहो,
लालची कहो,या
सनकी कहो,
अमीरों की अमीरी का,
पीछा करते हुये,
कई गरीब को ,
गरीब ही मरते देखा है।

अधीरता

लक्ष्य,अंजान की तरफ,
अंधाधुंध,
तीर चला रहे है,लोग;
अधीर होकर,
दौड़े जा रहे है,लोग;
सुनसान में,
कुतूहल है,
शमशान में भी,
हलचल है,
वादियों में,
वादीयों का,
कहर है;
कायदे,कानून और,
धारा की मारामार है,
मुख्य धारा से इतर,
बहे जा रहे है,लोग।

लक्ष्य

जब हम बड़े होते है,
अपने पैरों पर खड़े होते है,
गिरकर,सम्हले और
तूफानों से लड़े होते है।

वर्षों के,लंबे सफर में,
बेचैन वक्त और,
नाजुक मोड़ से मुड़े होते है;
कुछेक से जुड़े,और
असंख्य से, बिछड़े होते है।

वे लक्ष्य जो, तब अनदिखे थे,
उस मुकाम पर, अब पड़े होते है।

मानसून

आगे-आगे ,
काले मेघ,
उसके पीछे,
सारे मेघ ।

चिलचिलाती धूप,
हुई खतम,
बरसे बरखा,
छमछम...छम ।।

अरमानों का दफन

सूरज की रोशनी,
जब मद्धम होती है,
ऑफिस की प्रेशर,
कुछ कम होती है,
देह मे थकन,और
लवों पे सिकन होती है…


इस कंडीशन में,जब
उनसे अनबन होती है,तो
मेरी आँखें भी,
नम होती है,
अरमानों का दफन,और
सिने में जलन होती है।

घर और सफर

रोज निकलता हूँ,
घर से,
घर की,जरूरतों को
पूरा करने के लिये।

सफर करता हूँ,
मीलों तक,
सफर की,जरूरतों को
पूरा करने के लिये।

घर,सफर करने को
बेबस करता है,और
सफर,घर लौटने
को विवश करता है।।

अपना पता

अक्सर लोग पूछते हैं
मुझसे,मेरे घर का पता,
और मैं पूछता हूँ ,खुद से,
अपने घर का पता।

अपना घर कहाँ है?
वो वोटरकार्ड वाला पता,
ड्राईविंग लाईसेंस वाला पता,
या सर्टिफिकेट वाला पता?

कंक्रीट को घर कहूँ,या
कागज को?
पूछता हूँ ,खुद से ।।

पुरानी चीज

पुरानी बातों को
जब सोचता हूँ,
जी करता है
सोचता ही जाऊँ..।

लोग कहते है-
“पुरानी चीज
‘सोना’ होता है”,
मगर ये ‘सोना’,
चैन से,
‘सोने’ नहीं देता।।

अपनी-अपनी

इतनी भीड़ है,
इस शहर में,
सुध नहीं,किसी को,
अपनी ही,बजह पर।

आगे निकलने की
होड़ है,लेकिन
सारे रुके हुये है,
अपनी ही,जगह पर।

अपने-अपने,सपने के
महल में,
फँसे हुये से,घुट रहे,
अपनी ही,फतह पर।

लोगों का महत्व

कभी हमें लोगों की भीड़,
अशांत कर देती है,
कभी अपनेआप का ,
अकेलापन ।

कभी अपनों का प्यार,
ले डूबता है,
कभी अपनों का,
घृणित व्यवहार।

कईयों के सहयोग से
हम सफल होते है,
कई लोग हमें आजीवन
सफल होने देना नहीं चाहते।

सुकून

सर्द हवाओं से छूकर,
रूह जब सिहरती है..

उमड़ती घटाओं को देखकर,
आँखें जब बंद होती है..

नदी की कल-कल से,
मन जब विकल होता है..

भीगी माटी को कुरेदकर उँगलियाँ,
न जाने क्या महसूस करती हैं।

तलाश

चेहरों में,चेहरे का तलाश,
कभी खत्म नहीं होता..

चेहरा बदलने का अपना प्रयास..
कभी खत्म नहीं होता..

यूं तो अपने भी,कई चेहरे है..
लोगों को दिखाने के लिये..
कुछ ऐसे चेहरे हैं..आँखों में..
जिन्हें भुला देने का..कोई गम,
कोई अहसास नहीं होता ।

बेचैनी

आँखों की पुतलियाँ जब..
एक साथ नहीं ठहर पाती..
तो नींद नहीं आती है..

उमर भर के सफर के यादों को..
मन जब उलटता-पुलटता है..
तो नींद नहीं आती है..



गीली पलकों से झरते झरने..
बीहड़ रातों में.. जब शोर मचाती है..
तो नींद नहीं आती है..

समझौता

जग की मानें तो..
अपनी जान जाती है..
अपनी मानें तो..
जग की जान जाती है..।

जग में भी जीना है..
अपने को भी..जीना है..
अपने-आप में जीते है तो..
अपनों की जान जाती है..।

अंत में,
जग के लिये जीते है..
अपनों के लिये जीते है..
तो अपनी जान जाती है 

भावुकता

कुतर-कुतरकर नाखून को
दाँतों से..फेंकना..
अच्छा लगता है।

टक-टकी लगाकर कहीं..
अपलक ताकना..
अच्छा लगता है।


मसलकर पत्तियों को..
चुटकियों से..रगड़ना..
अच्छा लगता है।

छानकर धूल से..कंकरों को
पानी में..छींटना..
अच्छा लगता है।

सिहरन

एक तरफ सूकूँ की गोद है,
सो जाने के लिये,मूँदकर आँखों को।
दुजी तरफ असहनीय संघर्ष है,
मर जाने के लिये,रोककर साँसों को।

जितना हासिल हुआ है नाकाफी है,
लगता है,सीने में आग अभी बाँकी है।
रूहें खड़ी होती है अभी भी,
रगों में खून खौलती है अभी भी।

परिंदों-सा बेघर घूमने की आजादी है,फिर भी,
चारदीवारी में कैद रहने का मन आदी है।
बेखौफ होकर निकलता हूँ सबेरे अपने घर से,
बटोरकर शाम तक कुछ-न-कुछ ले आता इस शहर से!

निडर मन

निडर होकर जब मन सोचता है,
जीतने की ख्वाब देखता है
सौ मुश्किलें आ सामने से,
बार-बार रोकता है।

जूझता है जब कभी मन
अंतर्द्व्न्द की आँन्धियों से,
टूटते विश्वास को,
बेरहमी से झकझोरता है।

परेशानियों से आहत होकर
रगों की लहू जब ठहरती है,
शांत मन की चिंगारियाँ
भड़क उठने को मसोसता है।

संघर्ष की प्रेरणा

बीते हुये कल की उपलब्धियाँ,और
आने वाले कल की उम्मीदें,
संघर्ष करने को प्रेरित करते है।

अपनों को दिये गये आश्वासन,और
विरोधियों को दिये गये वचन,
संघर्ष करने को प्रेरित करते है।



अपनी जिंदगी तो हम बड़ी सहजता,और
सरलता से जीना चाहते
ये तो खुदा का इरादा है,कि वे
बेचैन होकर जीने को प्रेरित करते है।